निरंतर

ज़िन्दगी यूं थम सी जाती है  जब प्रयास नहीं होता निरंतर …

कुछ बंद से रास्तो में उलझी  हुई सी , जब हार होती है निरंतर

हर सिलसला चाहे हो दिल का या सांसो का …नहीं बढ़ता निरंतर

पर फिर भी उस विराम की उत्सुकता होती है हर वाक्य के आरम्भ मे

क्योंकि वो पूर्ण करता है…

या फिर वो अधूरापन अच्छा है जो अनदेखा है..

जिसकी तलाश मे ज़िन्दगी जीते है निरंतर

विराम का एक स्वतंत्र बिंदु या वो तीन बिंदु अपूर्ण पर आशावान…

हर विराम के बाद फिर नया कुछ…

या फिर बिना विराम के अपार संभावनाए  समटे वो तीन बिंदु…

गतिवान अटूट निरंतरता…झरने सी पवित्र गुंजन करती हुई टूट क़र फिर जुडती हुई वेगवान निरंतरता

उद्गम स्थल से अनिश्चित सी यात्रा परन्तु उत्साह से भरी झरने के निरंतरता…

शायद अनदेखी उत्सुकता समेते तीन बिंदु अच्छे है पूर्ण विराम चिन्ह के उस एक बिंदु से …

2 Responses to “निरंतर”

  1. कविता बहुत ही सरल और अर्थपूर्ण है || आपकी हिंदी भी बहुत सरल है जो हर कोई समाज सकता है || और आपने उस तीन बिंदु के बारे में बहुत ही सल्लिखिथा के साथ वर्णन किया है जो हर किसीका मन भावेगा|| शायद मेरी उतनी शुद्ध हिंदी न हो फिर भी हिंदी के लेखन को हिंदी में ही व्याख्यान करना उचित है यह सोचकर मैंने यह सहस की है|| यह बस आपकी कविता का प्रशाम्सना का प्रयास है||

  2. Excellent job!!!!!!!!!!!!!

    I really appreciate the writings………………….

    Great work done!!!!!!!!!!!!!!

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